Wednesday, January 7, 2009

Zindagi

एक वो दौर था जब किसी बाग़ में घूमते हुए
सिर्फ महकती हवा कानों को हलके से छूकर
गुनगुनाते हुए कहती थी - स्वागत है

और एक अनजानी सी हंसी उन अजनबी होंठों पर
ये गुमान कराती थी कि सिर्फ मैं ही नहीं हूँ

सिर्फ मैं ही नहीं हूँ जो खुश है
चटकती हुई कलियों पर बैठे भंवरों
की अठखेलियाँ देखकर
है कोई और भी जो समझता है कुदरत के इस इशारे को
कि ज़िन्दगी चार दीवारों से बाहर
कुछ आज़ाद और खुशनुमा सी है

कि ये खुशबू मन का भ्रम मात्र नहीं
ये रास्ता है उन मंजिलों का
जहाँ खुशियाँ बाहें फैलाये हुए
राह देख रही हैं उन अनजानों का
जो जीवन की आपा धापी में व्यस्त

कुछ भी सोचने का वक़्त नहीं निकल पा रहे

जो निकट दृष्टि दोष के कारण
सिर्फ दूर देखने में ही सक्षम हैं

और आज मंज़र यह है, कि ढूंढ रहा हूँ
ख़ुशी का एक पल, जब दिमाग विचारहीन हो
ऐसा लगता है मैं भी एक हूँ उनमे से
जो भूल चुके हैं कि जीवन क्या है?

मगर जीवन है जो हर बार याद दिलाता रहता है
कि मैं हूँ, यहीं हूँ.. तुम्हारे पास, तुम्हारे साथ

ख़ुशी को ढूँढने की दरकार उन्हें है
जो सुन नहीं सकते अपने दिल पर होती दस्तक
और देख नहीं पाते सर्दियों की उस धूप को
जो ठिठुरते हाथों को सहलाती है
और दे जाती है उन बेसहारों को सहारा
जो रात उस सुबह के इंतज़ार में बिता देते हैं

मैं खुश नसीब हूँ कि मैं सब सुन
और देख सकता हूँ ..
और कुछ ही क़दमों पर दिखती है मुझे
वो मृग-तृष्णा जिसका नाम है ... ज़िन्दगी

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